Friday, November 5, 2021

वैज्ञानिको की महान खोज : सर्वश्रेष्ठ आहार-शाकाहार'

 'शाक’ शब्द संस्कृत की ‘शक्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है योग्य होना, समर्थ होना, सहज करना । शक् धातु से शक्नोति इत्यादि शब्द बने हैं। शाक शब्द का अर्थ है-बल, पराक्रम, शक्ति एवं शक्त के मायने हैं -योग्य, लायक, ताकतवर। इस तरह शाकाहार का वाच्यार्थ हुआ ऐसा आहार जो मनुष्य की योग्यताओं का विकास करें और उसे बलशाली तथा पराक्रमी बनाये।


वेजीटेरियन शब्द लेटिन भाषा के ‘वेजीटस’ शब्द से जन्मा हैं, जिसका अर्थ है-स्वस्थ, समग्र, समर्थ, विश्वस्त, ठोस परिपक्व, जीवन, ताजा। प्रसीसी का ‘वेजीटेबिल’ शब्द का अर्थ है जीवन-संचारक, अंत जीवन से भरपूर।

महान् वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्सटाईन विशुद्ध शाकाहारी थे वे कहा करते थे कि शाकाहार की हमारी प्रकृति पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

सन् १९४५ में रसायन शास्त्र विषयक नोबल पुरस्कार से सम्मानित डा.अर्तुरी वर्ततेन (हेलिंस्की, फिनलैंड में जवे रासायिनिक शोध संस्थान के निर्देशक) ने कहा है कि दुग्ध शाकाहारीयों का फल, साग-सब्जी, दाल, वसा, न्यूनित दूध आदि से तमाम आवश्यक पोषक तत्व सहज ही मिल सकते हैं।

अमेरिका फूड एंड न्यूट्रीशन बोर्ड की नेशनल रिसर्च कौंसिल ने साफ कहा है कि अधिकांश षोषण विज्ञानी इस तथ्य से सहमत हैं कि यदि शाकाहार को यथोचित संयोजन किया जाए तो वह स्वयं में सम्पूर्ण /पर्याप्त आहार है। दुनिया के प्राय: सभी मुल्कों में शुद्ध शाकाहारियों ने अपना स्वास्थ्य उत्तम प्रकार से बनाये रखा है।

एक वैज्ञानिक खोज ने यह सिद्ध कर दिया है कि ‘शाकाहार में मांस से पांच गुणा अधिक शक्ति है’-ओरियन्टल वॉच्मेन पूना पृ.३५।

संयुक्त राज्य अमेरिका में डेढ़ करोड़ शाकाहारी लोग १९९९ तक हो चुके थे। गेलप पोल अनुमान के अनुसार यू.के.में हर हफ्ते ३ हजार लोग शाकाहारी बन जाते हैं। जिनकी संख्या करोड़ो में पहुच चुकी है।

शाकाहारियो का अच्छा स्वास्थ्य उनके आहार का परिणाम है यह विचार बर्लिन वेजीटेरियन स्टडी की जांच पड़ताल का है। जर्मन स्वास्थ्य दफ्तर के सामाजिक औषध और महामारी विज्ञान संस्थान ने १९८५ में उपर्युक्त अध्ययन शुरू किया था। अध्ययन के अनुसार शाकाहारियों का संतुलित स्वास्थ्य उसके मांस मछली आदि न खाने और मोटे रेशे वाले तथ कम कोलेस्टेरोल वाले अन्न उत्पादनों के सेवन करने का परिणाम है।

वीगन (शुद्ध शाकाहारी) जीवन शैली को एक वाक्य में परिभाषित करते हुए व्रूएल्टी प्र गाइड टू लन्दन के संपादक स्लेक्स बुर्व ने कहा है कि ‘‘एक शाकाहारी न तो किसी जन्तु के किसी अन्तर्वर्ती भीतरी भाग को खाता है और न ही उसके बाहरी भाग को ओढ़ता-पहनता है।’’

सन् १८३५ का दैदीप्यमान भारत मैने भारत की चतुर्दिक यात्रा की है और मुझे इस देश में एक भी याचक अथवा चोर नहीं दिखा। मैंने इस देश में सांस्कृतिक संपदा से युक्त, उच्च नैतिक मूल्यों तथा असीम क्षमता वाले व्यक्तियों के दर्शन किए हैं। मेरी दृष्टि में आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत जो कि इस देश का मेरूदंड रीढ़ है, उसको खंडित किए बिना हम देश पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते हैं। मैं प्रस्ताव करता हूँ कि इस देश की प्रचीन शिक्षण पद्धित उनकी संस्कृति को इस प्रकार परिवर्तित कर दें कि परिणाम स्वरूप भारतीय यह सोचने लगें कि जो कुछ भी विदेशी एवं आंग्ल है वही श्रेष्ठ एवं महान हैं इस तरह वे अपना आत्म सम्मान, आत्म गौरव तथा उनकी अपनी मूल संस्कृति को खो देंगें और वे वहीं बन जाऐंगें जो कि हम चाहते हैं-पूर्ण रूप से हमारे नेतृत्व के अधीन एक देश। (लार्ड मैकाले द्वारा २ फरवरी १८३५ को हाउस ऑफ कॉमन्स ब्रिटिश संसद में दिए गए भाषण का अंश) उपरोक्त ऐतिहासिक दस्तावेज की प्रतिलिपि सुप्रीम कोर्ट के जज द्वारा परमपूज्य जैन मुनि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज को उपलब्ध कराई गई।

अग्रवाल मूल में जैन ही है* ?

 अग्रवाल उत्तर भारत की सम्पन्न व शिक्षित वैश्य जाति है इसने भारत देश के उत्थान में अपना अविस्मरणीय योगदान दिया है, इस जाति के अनुयायी आमतौर पर हिंदू व जैन दोनो धर्मो के पालक रहे है, अग्रवाल जाति का इतिहास राजा अग्रसेन से शुरु होता है, और उनका राज्य महाभारत काल में हरियाणा प्रदेश के हिसार-रोहतक क्षेत्र में विस्तृत था इस जाति की उत्पत्ति के संबंध में जितने भी कथानक है वह सभी यूँ तो काल्पनिक ही है, पर उनपर अगर शोध हो तो वह निश्चित ही अग्रवाल जाति को प्रारंभ से जैन धर्म से जोड़ेंगे। वस्तुतः अग्रवाल भारत की मूल जाति रही है जो विदेशी आर्यो के अत्याचारों से पीड़ित होकर वैश्य वर्ण में आ गई। इसका ही विवेचन हम यहाँ करेंगे

 
परवर्ती वैदिक साहित्य में राजा अग्रसेन की कथा का वर्णन आता है जिसके अनुसार वह महालक्ष्मी के उपासक थे और सूर्यवंशी थे उन्होने एक बार अश्वमेध यज्ञ भी किया था और उसमे बलि देने की बात आई तो उन्होने इससे मना कर दिया ब्राह्मण आर्य यज्ञ के नाम पर हिंसा का तांडव रचाते थे तीर्थंकर नेमिनाथ (महाभारत काल) के काल में उनका वर्चस्व उत्तरी भारत के कई राज्यों पर था।  कई राजा उनकी बात मानकर हिंसक यज्ञो-कर्मकांडो का समर्थन भी करने लगे थे पर अहिंसक राजा अग्रसेन ने इससे स्पष्ट मना कर दिया बलि नहीं देने के कारण ही उन्हें आर्य ब्राह्मणों ने क्षत्रिय वर्ण से बाहर कर दिया तब अग्रसेन राजा ने वैश्य वर्ण स्वीकार किया।
  एक और वैदिक कथानुसार राजा अग्रसेन जब अपने लिए नई राजधानी की खोज में निकले तब उन्हें वर्तमान अग्रोहा के पास (जो उस समय घनघोर जंगल था) एक जगह शेर व गाय एक ही घाट पर जल पीते दिखे राजा अग्रसेन ने सोचा जहाँ पवित्र मैत्री व अहिंसा हिंसक जानवरो में भी हो वहाँ अवश्य ही हमे राजधानी स्थापित करना चाहिए तीर्थंकर के समवशरण में भी शेर व गाय एक ही घाट पर पानी पीते है संभव है कि उस समय वहाँ से तीर्थंकर का समवशरण गुजरा हो जिसके फलस्वरुप गाय व सिंह एक जगह जलपान कर रहे थे।
  इससे यह तथ्य सटीक हो जाता है अग्रसेन राजा कुल परम्परा से शाकाहारी थे एवं वह बाकी राजाओ की तरह आर्य ब्राह्मणों के विचारो से मान्य नहीं थे। उनका अहिंसा में भरपूर विश्वास था। इस तथ्य से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि उन्होने अंत समय में दिगंबर जैन मुनि दीक्षा लेकर आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त किया था, चूँकि प्राचीनकाल में जीवन के अंत समय में दीक्षा लेने की परंपरा रही थी।
  अग्रसेन राजा के 18 पुत्रो के नाम पर 18 गोत्रो के नाम पडे इनमे से 3 गोत्र आज भी परवार जैनो में व अग्रवालो में समान है( गोयल,कांसल,बांसल) इससे भी इनकी जैन धर्म से साम्यता ज्ञात होती है। यह कथा इतिहास काल के पूर्व की है जिसके संबंध में प्राचीन ग्रन्थो का अभिप्राय अनुसार अध्ययन ही प्रमाण है।
  अग्रोहा के पुरातत्व की ओर दृष्टि करे तो वहाँ से एक सिक्का खुदाई में प्राप्त हुआ है जिसके एक और वृषभ का चिह्न व दूसरी ओर प्राकृत भाषा में अग्र गणराज्य का उल्लेख है(जो अग्रवाल जाति को सिंधू घाटी सभ्यता से जोडते है।) प्राकृत भारत की सबसे प्राचीन भाषा रही है तीर्थंकरों ने अपने प्रवचन इसी भाषा में दिए। आचार्य भद्रबाहु द्वितीय के शिष्य लोहाचार्य (एक पट्टावली अनुसार आचार्य समन्तभद्र)  भद्दिलपुर(आज का विदिशा) से विहार करते हुए अग्रोहा के निकट पधारे उस समय यहाँ जैनधर्म का प्रचार-प्रसार बहुत था यहाँ के शासक दिवाकर ने आचार्य की वंदना की व उनसे प्रतिबोध पाकर जैन धर्म के प्रति श्रद्धा और दृढ की। प्राचीन काल में जिस धर्म का पालक राजा होता था उसी धर्म को प्रजा भी मानती थी इसी कारण उस क्षेत्र में रहने वाले सभी जाति के निवासियो ने जैन धर्म का पालन करना शुरु कर दिया। बाद में यहाँ के सभी लोगो ने मिलकर अग्रवाल जाति बनाई उन्हें आचार्य ने काष्टासंघी नाम दिया तब से लेकर अब तक काष्टासंघ की पीठ पर बनने वाले सभी भट्टारक अग्रवाल कुलोत्पन्न ही होते थे। यह घटना दूसरी शताब्दी के आसपास की है। अब तक चंपापुर(बिहार),ग्वालियर,तिजारा(राजस्थान) आदि कई स्थानो से खुदाई में अग्रवाल,अग्रोतक आदि प्रशस्ति लिखी जैन मूर्तियाँ प्राप्त हुई है। सम्राट अकबर के काल में साहू टोडर अग्रवाल ने मथुरा में 500 से अधिक जैन स्तूप बनवाए थे, अग्रोहा में भी खुदाई में स्तूप निकले है जैन धर्म में तीर्थंकरो की निर्वाण स्थली,मुनियों की समाधि स्थली पर स्तूप बनाने की परंपरा प्राचीनतम रही है अग्रवाल समाज में इस परंपरा का पालन मुगलकाल तक जारी रहा।

*अग्रवाल वैष्णव धर्मी कैसे बने*
  मुगलकाल मे जब जैन धर्मियो पर बहुत संकट आया ऐसे समय में उत्तर भारत में दिगंबर मुनियों का विहार खत्म हो गया तब पुष्टिमार्गीय सम्प्रदाय के संत वल्लभाचार्य ने अग्रवाल वैश्यो का हिंदू धर्म में धर्मान्तरण करवाया, यह कार्य आजादी के बाद तक चलता रहा।हरियाणा में हजारो जैन अग्रवाल आर्य समाजी बन गए लाला लाजपतराय दिगंबर जैन अग्रवाल थे पर आर्य समाज से जुड़कर उन्होंने जैन धर्म त्याग दिया। आज भी कई वृद्ध वैष्णव अग्रवाल यह बताते है कि हम बचपन में भाद्रपद मास में जैन मंदिर जाते थे बाद में हमने जैन और वैष्णव दोनो धर्मो को एक ही मानकर जैन गुरु का सानिध्य नहीं मिलने के कारण हिंदू धर्म का पालन करना शुरु कर दिया। कोलकाता के प्रसिद्ध बेलगछिया जैन मंदिर के निर्माता अग्रवाल श्रेष्ठी थे ऐसे कई विशाल मंदिरो का निर्माण अग्रवाल जैन बंधूओ ने करवाया था पर आज सभी जैन धर्म से परिचय टूटने के कारण वैष्णव धर्मी हो गए। आज वैज्ञानिक युग है ऐसे समय में वास्तविक इतिहास को समझकर युवाओ को अपने मूलधर्म के प्रति श्रद्धा बढानी चाहिए व जैन धर्म का अनुसरण करना चाहिए। वस्तुतः देखा जाए तो अग्रवाल समाज की अहिंसा प्रियता ही इसे जैन घोषित करती है।

सैंतालीस शक्तियाँ अर्थात् आत्मा का अनन्त वैभव

 कुन्दकुन्दाचार्य देव समयसार की पांचवी गाथा में कहते है कि-

मैं शब्द ब्रह्म की उपासना से जन्मा निज वैभव को दिखलाऊगा। वह निज वैभव अनंतगुणशक्तिमय है।
• जब अमृत की एक बूंद ही अमर कर सकती है तो फिर अमृत का घड़ा क्यों पीना ठीक उसी प्रकार जब आत्मा की अपनी शक्तियों में से एक रत्न से ही हम निहाल हो सकते है तब रत्नाकर की तो क्या बात करना।
• ज्ञेयलुब्धता और व्यग्रता के चक्कर में हम रत्नाकर को भूल बैठे हैं ।
          चिदानंद आनंदमय, सकति अनंत अपार |
         अपनो पद ज्ञाता लखे जामें नहिं अवतार ।।
• अनंतधर्मणस्तत्त्वं पश्यंती प्रत्यगात्मनः
विषय – आत्मा के ज्ञानमात्र में अनंत शक्तियां उछलती (परिणमती) है |
         १-     अनंत धर्मो के समुदाय रूप परिणमित एक
                  ज्ञप्ति मात्र भाव वह आत्मा है |
• ज्ञान मात्र = ज्ञान की पर्याय ज्ञान अकेला नहीं वरन अभेद अनंत गुणात्मक आत्मा की पर्याय समझना |- पृ-३२

१-     एक-२ शक्ति में अनंत सामर्थ्य |

• अंश में अंशी का पूर्ण अनुभव आया है
• गुण अनंत के रस सबै, अनुभव रस के मांहि |
यातें अनुभव सारिखो, और दूसरों नाहिं ||१५३ ज्ञान दर्पण।।


• आत्मख्याति 👇
परस्परव्यतिरिक्तानंतधर्मसमुदायपरिणतैकज्ञप्तिमात्रभावरूपेण स्वयमेव भवनात् । अत एवास्य ज्ञानमात्रैकभावांत:पातिन्योऽनंता: शक्तयः उत्प्लवंते।

उस ज्ञान के साथ अविनाभावीरूप से रहनेवाला अनन्तधर्मों के समुदायरूप जो भी लक्षित होता है, पहिचाना जाता है; वह सब वास्तविक आत्मा है।
परस्पर भिन्न अनंत धर्मों के समुदायरूप से परिणत एक ज्ञप्तिमात्रभावरूप स्वयं होने से यह भगवान आत्मा ज्ञानमात्रभावरूप है।
                      यही कारण है कि उसमें ज्ञानमात्रभाव की अन्तः - पातिनी अनंत शक्तियाँ उछलती हैं ।

गुण एक-एक जाकै, परजै अनंत करे; परजै मैं नंत नृत्य, नाना विसतय है । नृत्य मैं अनंत थट, थट मैं अनंत कला; कला मैं अखंडित, अनंत रूप धर्यो है ॥ रूप मैं अनंत सत, सत्ता में अनंत भाव; भाव को लखावहु, अनंत रस भय है । रस के स्वभाव मैं, प्रभाव है अनंत 'दीप'; सहज अनंत यौं, अनंत लगि कर्यौ है ॥
इस सम्पूर्ण विषय को निम्न अधिकारों के माध्यम सुस्पष्ट किया जा सकता है से

● गुणों की पर्यायें

•पर्यायों के नृत्य

•नृत्यों के घाट

•घाटों की कलाएँ

• कलाओं के रूप

• रूपों के सत्

• सत्ताओं के भाव

•भावों के रस

• रसों के प्रभाव

अनन्तता की यह उत्तरोत्तर अनन्त यात्रा हम आप के जीवन की दरिद्रता को दूर करे इस मंगल कामना के साथ विराम लेता हूँ. विशेष आगले अंक में...

• गुण की विशेषता 👇

एक गुण में सब गुणों का रूप होता है। वस्तु में अनन्त गुण हैं और प्रत्येक गुण में सब गुणों का रूप होता है, क्योंकि सत्तागुण है तो सब गुण है। अतः सत्ता के द्वारा सब गुणों की सिद्धि हुई। सूक्ष्मगुण है तो सब गुण सूक्ष्म हैं । वस्तुत्वगुण है तो सब गुण सामान्य विशेष रूप है । द्रव्यत्वगुण है तो वह द्रव्य को द्रवित करता है, व्याप्त करता है । अगुरुलघुत्वगुण है तो सब गुण अगुरुलघुत्व हैं | अबाधित गुण है तो सब गुण अबाधित हैं। अमूर्तिकगुण है तो सब गुण अमूर्तिक हैं ।

इसप्रकार प्रत्येक गुण सब गुणों में है, और सबकी सिद्धि का कारण है । प्रत्येक गुण में द्रव्य गुण पर्याय तीनों सिद्ध करना चाहिए। जैसे एक ज्ञानगुण है, उसका ज्ञानरूप 'द्रव्य' है, उसका लक्षण 'गुण' है। उसकी परिणति 'पर्याय' है और प्राकृति 'व्यञ्जनपर्याय' है ।

•  शक्तियों में अनंतता
1.  अनंतधर्मत्वशक्ति:👉   विलक्षणानंतस्वभावभावितैकभावलक्षणा अनंतधर्मत्वशक्ति:।
    परस्पर भिन्न लक्षणोंवाले अनंत स्वभावों से भावित - ऐसा एक भाव है लक्षण जिसका ऐसी अनंतधर्मत्वशक्ति है ।
2.जीवत्व शक्ति 👉 इससे यह आत्मा अनाद्यनंत है और इससे अनन्त गुण को चैतन्यमात्र युक्त रखने की सामर्थ्य वाला है ।

3. चिति-दृशि शक्ति 👉चितिशक्ति को पृथक् कहने का कारण यह है कि चेतनशक्ति अपनी अनन्त प्रकाशरूप महिमा को धारण करती है यही दिखाने के लिए उसे पृथक् कहा है ।

[  ] चिद्विलासाभिगत वर्णित आत्मा का वैभव
• संज्ञा,संख्या,लक्षण और प्रयोजन की अपेक्षा अनंत गुण का वर्णन
• सभी गुण अपनी अपेक्षा द्रव्य क्षेत्र काल भाव- स्वचतुष्टयात्मक है।
•  चार शंका के समाधान से स्वरूप समझा जाता है-
       आश्रय?                      नित्यानित्य
       एकानेक?                  अस्तिनास्ति?  ?
• गुण विशेष को समझने के लिए सप्त प्रकार
(क्योंकि विशेषज्ञान से विशेषसुख प्राप्त होता है )
( १ ) नाम ( २ ) लक्षण (३) क्षेत्र (४) काल ( ५ ) संख्या ( ६ ) स्थानस्वरूप तथा ( ७ ) फल ।

• अनादि अनन्त, अनादि-सान्त, सादि-सान्त और सादि अनंत- ये चार भङ्ग सब गुणों में सिद्ध होते हैं।
१. वस्तु की अपेक्षा ज्ञान अनादि अनन्त है, २. द्रव्य की अपेक्षा अनादि और पर्याय को अपेक्षा सान्त है, अतः ज्ञान अनादि सांत है, ३. पर्याय की अपेक्षा ज्ञान सादि-सान्त है तथा ४. पर्याय की अपेक्षा सादि और द्रव्य की अपेक्षा अनन्त है, अतः ज्ञान सादि अनन्त भी है ।
• उपचार से प्रत्येक गुण के छत्तीस भेद
    सामान्यभेद 👉 द्रव्य; गुण; पर्याय (3*3)
     विशेषभेद👉स्वजाति, विजाति, स्वजाति-विजाति(मिश्र)
                       सामान्य*(9*4=36)
• प्रत्येक शक्ति में षट् कारक
• प्रत्येक गुण में स्व और पर(अन्य गुण )की अपेक्षा सप्तभंगी घटित होती है । ऐसे अनंत गुणों में अनंत भंगी लागू होती है ।
• द्रव्य गुण पर्याय में कारण कार्यपना (कौन किसका कारण है?) (जिन्होने कारण कार्य को जान लिया उन्होंने सब जान लिया)

• पूज्य गुरुदेव श्री
प्रत्येक शक्ति में लागू होनेवाले 23 बोल

इस समयसार परमागम के परिशिष्ट में समागत 47 शक्तियों पर पूज्य गुरुदेव श्री द्वारा लिखायी गयी नोंध इस प्रकार है ।

1. क्रमरूप और अक्रमरूप अनन्त धर्मसमूह जो कुछ जितना लक्षित होता है,
वह सब ही वास्तव में एक आत्मा है ।

2.ज्ञानमात्र एक भाव की अन्तः पातिनी अनन्त शक्तियाँ उछलती हैं ।

3. क्रमवर्तीरूप और अक्रमवर्तीरूप वर्तन जिनका लक्षण है ।

4. एक - एक शक्ति अनन्त में व्यापक है ।

5. एक शक्ति अनन्त को निमित्त है ।

6. एक शक्ति द्रव्य-गुण- पर्याय में व्यापती है ।
7. एक शक्ति में ध्रुव उपादान, क्षणिक उपादान है।

8. एक-एक शक्ति में व्यवहार का अभाव है।

9. यही अनेकान्त है, स्याद्वाद है।

10. शक्ति पारिणामिकभाव से है ।

11.कर्ता आदि छह कारक अभिन्न हैं और निरपेक्ष है।

12. प्रत्येक शक्ति में अनन्त का रूप है ।

13. जन्मक्षण, वही नाशक्षण ।

14. उत्पाद, उत्पाद के कारण से है ।

15. काललब्धि है ।

16. अपने-अपने अवसर में होता है

17. निश्चय - व्यवहार है ।
18.शक्ति और शक्तिवान का भेद भी दृष्टि का विषय नहीं है।

19.क्रमवर्ती ज्ञानपर्याय, वह पर को जानती है, यह भी व्यवहार है ।

20. जाननेवाला, जाननेवाले का है, ऐसे स्वस्वामी अंश से क्या साध्य है ।

21. राग को उपादेय माने, वह आत्मा का हेय मानता है; - आत्मा को उपादेय माने, वह राग को हेय मानता है ।

22.प्रत्येक शक्ति में अकार्य-कारण का रूप है ।

23. प्रत्येक शक्ति में त्याग-उपादानशून्यत्व है ।
👉परमागम श्री समयसारजी की ४७ शक्तियों के उपरान्त शास्त्र समुद्र का मन्थन करके पूज्य गुरुदेवश्री ने खोज निकाली हुई कितनी ही शक्तियाँ...और भी है।

• गुरूदेव श्री द्रव्य में कितनी शक्तियाँ हैं इसका भाव भासन कराने के लिए कहते थे-
    एक द्रव्य में शक्तियाँ
     जीव अनंत
    पुद्गल अनंतानंत
    तीन काल के समय उससे अनंतानंत
    आकाश के प्रदेश उससे अनंतानंत
    उससे अनंतगुणे जीव द्रव्य में अक्रम गुण/शक्ति
• सामान्य फल- सुख या आनन्द अनन्त गुणों की उस शुद्धता का फल सुख है।
• लाभ-

1} चिदानंद आनंदमय, सकति अनंत अपार ।
    अपनो पद जाता लखे जामे नहि अवतार || चिद्विलास

3} विशेषज्ञान से विशेषसुख प्राप्त होता है।
                                      - चिद्विलास

2} गुण अनंत के रस सबै, अनुभव रस के माहि
    यातै अनुभव सारिखो, और दूसरों नाहि || १५३||
                                           -ज्ञान दर्पण

4] सुख या आनन्द अनन्त गुणों की उस शुद्धता का फल सुख है।

5) अनंत गुणों को जानने से दीनता एवं हीनता का भाव मिटता है।

6} परसन्मुखता मिटती है एवं स्वसन्मुखता होती है।

7] अगाध ज्ञान स्वभाव की विशेष महिमा आती है।

8} अनंत उछलती हुई शक्ति को जानकार तृप्ति का भाव जागृत होता है।

जैनी भये जैनी के निंदक

 जैनी भये जैनी के निंदक

आचार्य कुन्दकुन्द देव का नाम आज सम्पूर्ण दिगम्बर जैन समाज में अग्रणीय है। गंभीरता से विचार किया जायें तो हम पायेंगे कि- वास्तव में आचार्य कुन्दकुन्द देव को संरक्षणता की आवश्यकता कदापि नहीं हैं। लेकिन हाँ यदि दिगम्बर जैन समाज को अपना मूल आधार बनाये रखने के लिए हमें निःसंदेह कुन्दकुन्द आचार्य देव की महती आवश्यकता है।  आचार्य कुन्दकुन्द कितने महान आचार्य थे - उनकी प्रतिभा पर दिगम्बर जैन समाज को कोई संदेह नहीं है ।
"मंगंलम् कुन्दकुन्दार्यो" -गणधरदेव के बाद उनका नाम बडे ही सम्मान से लिया जाता है।
        किंतु वर्तमान परिस्थिति में कुछ विद्वान जैनधर्म का इतना सीधा- सच्चा स्वच्छ मार्ग होने पर भी कुछ (तथाकथित) लोग जैन धर्म का मार्ग मलिन करना चाहते है । यदि हम इतिहास में दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि - आचार्य कुन्दकुन्द देव ने किन - किन विषम परिस्थितियों में इस कालजयी कृति की रचना कर जैनधर्म का मूल अध्यात्म सुरक्षित रखा परंतु बत॰॰॰

कैसे थे वे लोग जो टेढ़े-मेढ़े रास्ते पर भी सीधा चला करते थे। गजब की बात तो यह है कि लोग आज सीधे- साधे रास्ते पर भी तेरा- मेडा चला करते हैं ।

• यद्यपि NO REPLY IS BEST  REPLY लेकिन "मौनं सम्मति लक्षणम्" इसके लिए ही मैं यहाँ कुछ कहता हूँ वरना  अनागत पीढी पूछेंगी; कि - जब ये हुआ तो आप खामोश क्यों थे ???
खैर;
मुझे प्रतीत होता है कि- सम्पूर्ण दिगम्बर जैन समाज को अपना अस्तित्वबोध कराने के लिए या हम भी कोई चीज़ है तथा सम्पूर्ण आत्मलाभार्थियों को अपने ऊपर ध्यान केंद्रित करने की इच्छा से यह बेबुनियात पोपगेंडा खडा किया है।
तथोक्तं-
घटं भिन्द्यात् पटं छिन्द्यात् कुर्याद्रासभरोहणम् |
येन केन प्रकारेण प्रसिद्ध: पुरुषो भवेत् ||
अर्थ- घड़े फोड़कर, कपड़े फाड़कर या गधे के ऊपर चढ़कर. कुछ लोग किसी भी तरह, कुछ भी करके लोकप्रिय होना चाहते हैं ||

परीक्षामुख में स्पष्ट कहा है कि - "...नोदाहरणम्" उदाहरण वादविवाद का विषय नहीं होता तभी तो उसे विजिगीषु कथा से वंचित रखा है ।
दूसरी यह बात भी तो है कि- उदाहरण (दृष्टांत )एक देश होते है ।
यदि दृष्टांत को सर्वदेश माना जाएगा तो वह दृष्टांत न होकर सिद्धांत ही बन जायेंगा।
यद्यपि मैं  क्या कोई भी दृष्टांत की महती उपयोगिता का अपलाप नहीं कर सकता। यदि दृष्टांत की महती उपयोगिता जाननी होवें तो प्रो॰ वीरसागर जी दिल्ली का "दृष्टांत स्फुटायते मति: " लेख देखना ही पर्याप्त है।
लेकिन दृष्टांत विवाद का विषय नहीं हो सकता क्योंकि वह प्रयोजन नहीं होता और सही दृष्टांतों को भी गलत समझकर  अप्रमाणिक घोषित करना एक अपराध है।
एक बात यह भी है कि- "नयविभागानभिज्ञोऽसि" अल्पज्ञान से अंध हुए ये लोग मदोन्मत हाथी की तरह कुछ "मैं सब कुछ जानता हूँ "- मैं सब कुछ जानता हूँ-इस अभिमान में दग्ध होकर सर्वमान्य दिगम्बर आचार्य कुन्दकुन्द देव के ऊपर ही अंगुली उठाते हैं।
श्री मद् राजचंद्र जी ने सम्यक्त्व से भ्रष्ट होने के तीन कारण बताये
  1) गुरू का गुरू बनना चाहता है
2)  तीव्र विषयाशक्ति
  3) मैं बहुत जानता हूँ- लेकिन आपमें अनुरंजित पहला और तीसरे कारण से यह जान पडता है कि- आप अभी सम्यक्त्व से योजनों दूर है।
कुन्दकुन्द आचार्य देव ने तो पांचवी गाथा में हमें जागरूक किया था कि - "छलं न घेतव्वम्" और आप वही कर बैठे सो जैसे पिता जिस कार्य को मना करें और पुत्र वहीं करें सो वह दण्डयोग्य है सो आपने भी वही कार्य कर सम्पूर्ण परंपरा को कलंकित करने का प्रयास किया है।
यह समयसार तो ऐसी संजीवनी है जिसने कई लोगों के जीवन में क्रांति लाई; कईयों का तो इसने सम्पूर्ण जीवन ही परिवर्तित कर दिया ।
• आ॰ शांति सागर जी महाराज कहा करते थे कि-
      समयसार पड़े जो कोई, ताही तनाव कभी नहीं होई।
और हा॰मा॰॰धिक्॰॰॰ खेद(बत) है कि - आज आपने समयसार को ही एक तनाव का विषय बना दिया।
बलिहारी पंचम काल की इसमें जो हो सो कम है ...
कविराज द्यानतराय ने कहा ही -
  जैनी भये जैनी के निंदक, पंचम काल जोरा ।
   द्यानत सब देखकै चुप रहिए, जग में जीवन थोडा।।
        इत्यलम्
                - आप्त जैन शास्त्री 

21वी शताब्दी का धर्म : जैनधर्म

 21वी शताब्दी का धर्म 


            लेखक - मुजफ्फर हुसैन 


[ एक मुस्लिम चिन्तक की द्रष्टि से जैन धर्मं का महात्म्य और उसमे निहित असीम संभावनाए ]


---> 21वी शताब्दी का धर्मं 'जैन धर्मं' होगा ! इसकी कल्पना किसी सामान्य आदमी ने नहीं की है, बल्कि 'बनार्ड शो' ने कहा कि यही मेरा दूसरा जन्म हो तो मैं जैन धर्मं में पैदा होना चाहता हूँ, ये बात स्वयं 'बनार्ड शो' ने गाँधी जी के पुत्र देवदास गाँधी से कही थी !


---> रेवेरेंड तो यहाँ तक कहते है कि दुनिया का पहला मजहब जैन था और अंतिम मजहब भी जैन होगा !


---> बाल्टीमोर [USA] के दार्शिनिक डॉक्टर मोराइस का कहना है कि यही जैन धर्म को दुनिया ने अपनाया होता तो यह दुनिया बड़ी खुबसूरत होती !


---> जस्टिस रानाडे ने कहा कि ऋषभदेव, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महावीर, ये चार तीर्थंकर नहीं बल्कि जीवन और चिंतन कि चार दिशाए है !


ऐसा जैन धर्मं में क्या है ? जैन धर्मं सिर्फ धर्म नहीं, जीवन जीने का दर्शन है, सरल भाषा में कहू तो यह खुला विश्वविद्यालय है ! आपको जीवन का जो पहलु चाहिए वो यहाँ मिल जायेगा ! दर्शन ही नहीं बल्कि संस्कृति, कला, संगीत और भाषा का यह संगम है ! जैन तीर्थंकरो ने संस्कृत को न अपनाकर जनभाषा प्राकृत को अपनाया, क्योकि वे जैनदर्शन को विद्वानों तक सीमित नहीं रखना चाहते थे ! वह तो सामान्य आदमी तक पहुचे और उसके जीवन का कल्याण करे, यह चिंतन था !


दुनिया के सभी धर्मो ने अपने चिन्ह किये, इनमे कुछ हथियार के रूप में, तो कुछ आकाश में चमकने वाले चाँद और सूरज के रूप में ! 24 तीर्थंकरो में एक भी ऐसा नहीं दिखलाई पड़ता जिसके पास धनुष-बाण हो या फिर गदा अथवा त्रिशूल हो ! हथियारों से लेस दुनिया के रजा अपनी शानो-शोकत से अपना दबदबा बनाये रखने में अपनी महानता समझते थे, लेकिन यहाँ तो भोले-भाले पशु-पक्षी अथवा जलचर प्राणी उनके साथ है, उनका कहना था हम साथ साथ जियेंगे और इस दुनिया को हथियार रहित बनायेंगे ! इन्सान ने सुविधा के लिए घोड़े, हाथी, गरुड़, मोर और न जाने किन किन प्राणियों को अपनी सवारी बना ली ! लेकिन जैन तीर्थंकर तो किसी को कष्ट नहीं देना चाहता है, वे अपने पाँव के बल पर साड़ी दुनिया को उगालते है और प्रकृति के भीड़ को जानने कि कोशिश करते है ! रहने को घर नहीं, खाने कोई स्थायी व्यवस्था नहीं, लेकिन दुनिया के कष्टों का निवारण करने के लिए अपनी साधना में कमी नहीं आने देते !


दुनिया में असंख्य वाद है, जो भिन्न भिन्न विचारधारा पर अपना चिंतन करते है, ये विचार से समाज बनाते है, लेकिन जैन धर्मं समाज को व्यक्ति में देखता है, हर वाद ने व्यक्ति को छोटा कर दिया, लेकिन हम देखते है जैन विचार ने मनुष्य को सबसे महान बना दिया, किसी भी हालत में वह व्यक्ति की गुण और उसके सामर्थ्य को समाप्त नहीं होने देता, दुनिया के अन्य धर्म मनुष्य को सामाजिक प्राणी बनाकर उसे जीवन यापन करने केलिए लाचार बना देते है, लेकिन यहाँ तो मनुष्य को अपनी स्वतंत्रता सर्वोपरि है, वास्तव में तो यही स्थिति उसे 'अहं ब्रह्मास्मि' की ऊचाईयो तक पहुचाती है, आदमी से समाज बने तो क्या बड़ी बात है, इंसान को वह भगवान् ही नहीं, बल्कि इस समस्त दुनिया का रचयिता बनाने की बात करता है, इंसान का बनाया कंप्यूटर अपग्रेड हो सकता है तो फिर इंसान क्यों नहीं ? चाँद-सितारों को छुने वाला इंसान जब भगवान् बन जायेगा तो फिर क्या उस समय अपनी सीमा में उसे बाँध सकेगा ? वह 21वी शताब्दी की नहीं बल्कि इस अजर और अमर दुनिया का प्रणेता बन जायेगा !


आज हिंसा के प्रतिक है - ओसामा, ओबामा और अमेरिका ! इन तीनो 'अ' को पराजित करने वाला है जैन दर्शन अपनी झोली में एक संजीवनी को संजोये हुए है जिसका नाम है अहिंसा, अनेकान्तवाद और अपरिग्रह ! तीनो एक-दुसरे से जुड़े हुए हिया, ये अलग नहीं हो सकते, चन्द्रगुप्त, अशोक और हर्षवर्धन उस खून-खराबे को नहीं देख सके इसलिए तो फिर उन्होंने कसम खाई की वे अब युद्ध नहीं करेंगे ! रावण से युद्ध करने वाले राम ने कहा, अ अयुद्ध चाहिए और अयोध्या को बसा लिया ! एक क्षत्रिय कहता है अब वध नहीं होगा तभी तो उसका सामाज्य अवध के नाम से प्रसिद्ध हो गया, हर लड़ाई के बाद इंसान शांति की तलाश में चलने को मजबूर हो गया ! पहला विश्व युद्ध समाप्त हुआ तो ईसा के मानने वालो ने लीग लोग नेशन बनायीं ! लेकिन फिर भी द्वितीय विश्वयुद्ध की महाज्वाला भड़की को राष्ट्रसंघ बन गया ! हर युद्ध के बाद अयुद्ध और हर हिंसा के बाद अहिंसा, यह इंसान की खोज रही है ! एटम बम डालने वाले जनरल इश्वर को पता लगा कि हिरोशिमा और नागासाकी में क्या किया, तब उसे भारत कि याद आई और अपनी माँ से कहने लगा - मुझे कोई श्वेत वस्त्रधारी महाराज के पास ले चल, मुझे वहा शांति मिलेगी क्योंकि उसने पढ़ा था कि भारत को न जेट सकने वाला सिकंदर जब लोट

[18/06 9:42 am] शैलेन्द्र शाह जैन उज्जैन: रहा था तो उसे एक जैन साधू ने कहा था: "दुनिया को जीतने वाले काश !! तुम अपने आपको जीत सकते !" जैन साधू को सिकंदर अपने साथ ले गया ! जैन साधू सिकंदर के बाद में एंथैस में वर्सो तक लोगो को अहिंसा का सन्देश देता रहा ! एंथैस से सब कुछ बदल गया, लेकिन आज भी वहा जैन साधू कि प्रतिमा लगी हुई है, प्लेटो और एरिस्टोटल का एंथैस इतना प्रभावित हुआ कि "पैथागोरस जैसा गणितज्ञ कहने लगा कि मैं जैन हो गया हूँ !"


21वी शताब्दी पानी के संकट कि शताब्दी है ! जैन मुनि तो कम पानी पीकर अपना काम चला लेते है, लेकिन हम जैन लोग क्या करेंगे ? उसका मूल मन्त्र है शाकाहार जो शांति, क्रांति हार्द और रक्षा को परिभाषित करता है ! मांसाहार के लिए हाईब्रिड बकरे, डुक्कर और मुर्गिया पैदा कि जा रही है ! इन कृत्रिम पधुओ पर अध्ययन करे तो एक बकरी का बचा यदि एक केलो है तो उसे दो किलो बनाने में 5,000 गैलन पानी लगता, लेकिन एक किलो टमाटर को पैदा करने केलिए चाहिए सिर्फ 160 लीटर पानी ! भारी जल संकट के समय आप क्या करेंगे ?


भूकंप, ज्वालामुखी और सुनामी अब हमारे भाग्य बन गए है ! जानवरों के क़त्ल के कारन यह विपदाए आती है ! यदि विश्वास न आये तो 'बिसालॉजी' का अध्ययन जरुर कीजिये, जिसका अर्थ वह ज्ञान-शाखा है, जो breakdown of integrate system - समन्वित व्यवस्थाओ के विभाग अर्थात टूटने के कारन कि खोज करती है ! बीस सिद्धांत पहले डॉक्टर बजाज, इब्राहिम और सिंह के प्रथम रोमन अक्षरों से बना एक संक्षिप्त शब्द था, किन्तु अब यह एक नयी विज्ञान शाखा के रूप में विकसित हो गया है, एक संकट से उबारने वाला धर्मं ही केवल 21वी शताब्दी का धर्मं बन सकता है !


6 अरब की यह दुनिया कहा जाकर रुकेगी ? साधन और स्त्रोत कम होंगे तो फिर टकराव अवश्य होगा ! क्या ब्रम्हचर्य इसका उपाय नहीं है ? मोक्ष चाहते हो तो मौत और जीवन के चक्कर से निकलो ! स्वयं ऐसा करना चाहते हो तो फिर दुसरो को जन्म देकर उसके सिर पर पाप की गठरी क्यों रखना चाहते हो ?


21वी शताब्दी में नारी स्वतंत्रता की बात कही जाती है ! जैन धर्मं में झांककर देखो तो यहाँ साध्वियो को कितना बड़ा सम्मान मिला है ! वे पूजनीय है ! धर्मं को पढ़ाती और सिखलाती है ! ईसाइयो में मोरियम के बेटियों के साथ क्या किया ? तलाक, तलाक और तलाक - यह कानो को फाड़ देते है ! दासी और भोगिनी को साध्वी बना देने का चमत्कार केवल जैन धर्मं में किया है ! समानता और स्वतंत्रता के साथ उनका स्वाभिमान स्थापित किया है !


20वी सदी ने अणु को तोडा, परमाणु ने चमत्कार किया ! उसने उर्जा का पुंज एटम बम तैयार हो गया ! जैन धर्मं का भेद-विज्ञान आत्मा और शरीर को अलग कर देने वाला बहुत पुराना विज्ञान है ! आत्मा ही तो एटम है जो समस्त दुनिया में शक्ति का संचार करती है !


भारतीय दर्शन में 'वसुधैव कुटुम्बकम' की कल्पना की गयी है, जिसका आधार सहअस्तित्व है ! इसे सर्वधर्म-समभाव की संज्ञा भी दी जाती है ! लेकिन आज तक यह शब्दावली केवल राजनीति के दाएरे में ही प्रस्तुत की गयी है ! यदि आप अध्यात्म के आधार पर इसका विचार करते है तो फिर आपको जैन दर्शन की और लोटना पड़ेगा ! नागरिकता और राष्ट्रीयता एक दिनों हर देश में मानव का आधार है, लेकिन जब तक समानता और स्वतंत्रता नहीं मिलती, ये शब्द खोखले मालुम पड़ते है ! मनुष्य के कष्टों की निवारण और अंतर्राष्ट्रीय आधार पर उसका उधार केवल और केवल, जैन दर्शन में माध्यम से ही संभव है !......

गुण की व्युत्पत्ति और उसके पर्यायवाची नाम

 गुण की व्युत्पत्ति और उसके पर्यायवाची नाम


 तम्हा जिणमग्गादो गुणेहिं आदं परं च दव्वेसु ।
अभिगच्छदु णिम्मोहं इच्छदि जदि अप्पणो अप्पा ॥९०।।

                                                      - प्रवचनसार

 गुण क्या है ?
आज जैनदर्शन में द्रव्य का लक्षण 'गुणपर्ययवद्द्रव्यम्"  तत्वार्थसूत्र में कहा है, अत: गुण का स्वरूप जानना आवश्यक है क्योंकि गुणों को जाने बिना द्रव्य को जानना भी असम्भव हो जाएगा। यद्यपि वैशेषिक आदि दर्शनों ने गुण को द्रव्य से सर्वथा पृथक् पदार्थ के रूप में मान्य किया है, लेकिन जैनदर्शन ने उसे द्रव्य से सर्वथा पृथक् पदार्थ के रूप में मान्य नहीं किया है यद्यपि उसे कथंचित् पृथक् पदार्थ के रूप में उसे मान्य किया गया है। हमारे जिनागम में न केवल द्रव्यानुयोग में अपितु सभी अनुयोग में गुण शब्द का प्रयोग द्रष्टंगत होता है –

•   चारों अनुयोग में गुण शब्द का प्रयोग

   1)  प्रथमानुयोग👉 स्थान /देश अर्थ

   2) करणानुयोग 👉 गुणस्थान / पंच भाव/गुण श्रेणी निर्जरा/ गुण संक्रमण

  3) चरणानुयोग 👉 मूलगुण/उत्तर गुण/महाव्रत/क्षमादि धर्म/ 64 ऋद्धि / अणिमादि 8 गुण/संयमादि

   4)द्रव्यानुयोग 👉 धर्म /गुण/ शक्ति / आत्मा को गुण कहा/सम्यग्दर्शनादि गुण

 
गुण का स्वरूप
" द्रव्याण्याश्रयत्वेनेयति द्रव्यैराश्रयभूतैर्यन्त इति वा अर्था गुणाः"          - प्रवचनसार

"जो द्रव्यों को आश्रय के रूप में प्राप्त करते हैं या आश्रयभूत द्रव्यों के द्वारा प्राप्त किये जाते हैं, वे अर्थ गुण हैं।"

 गुण की व्युत्पत्ति-

1) गुण की व्युत्पत्ति करते हुए श्रीदेवसेनाचार्य कहते हैं -

  " गुण्यते पृथक्क्रियते द्रव्यं द्रव्यान्तराद्यैस्ते गुणाः "     

                                             -आलापपद्धति, 16
अर्थात् जो द्रव्य को द्रव्यान्तरों से पृथक् करता है, उसे गुण कहते हैं।

 
2)  श्रुतसागरसूरि ने इस व्युत्पत्ति में 'विशिष्यते (तत्वार्थवृत्ति, 5/38 ) पद और भी जोड़ दिया है अर्थात् गुणों के कारण द्रव्यों में विशेषता आती है।

 
3) इसी कारण आचार्य अमृतचन्द्र ने तत्त्वप्रदीपिका में कहा है -            "अन्वयविशेषणं गुण:"                

                                                    -( प्रवचनसार, 80)
उन्होंने द्रव्य को अन्वय कहा है और गुण को अन्वय के विशेषण कहा है और पर्यायों को अन्वय के व्यतिरेक कहा है। वहीं अन्यत्र वे गुणों को 'विस्तारविशेष' (तत्वप्रदीपिका, प्रवचनसार, 93) भी कहते हैं।

   एकमात्र द्रव्य जिनका आश्रय है ऐसे विस्तारविशेषस्वरूप गुणों से रचित होने से द्रव्य गुणात्मक हैं ।

3) स,सि./५/३८/३०६
"पर उदधृत गुण इदि दव्वविहाणं" ।
अर्थ- द्रव्यमें भेद करने वाले धर्म को गुण कहते हैं।

 4) न्या.दी./३/७८/१२१ यावद्द्व्यभाविनः सकलपर्यायानुवतिनो गुणाः बस्तुत्वरूपरसगन्धस्प्शादयः । - जो सम्पूर्ण द्रव्यमें व्याप्त कर रहते हैं और समस्त पर्यायोंके साथ रहनेवाले हैं उन्हें गुण कहते हैं । और वे वस्तुत्व, रूप, रस, गन्ध और स्पर्शादि हैं ।

 5) सिद्धान्ताचार्य पण्डित कैलाशचन्द जैन ने लिखा है-

"जिसके कारण द्रव्य सजातीय से मिलते हुए और विजातीय से भिन्न प्रतीत होते हैं, वे गुण कहलाते हैं । ये गुण ही अनुवृत्ति और व्यावृत्ति के साधक होते हैं।" (जैन न्याय, भाग-1,2)

 
गुण के पर्यायवाची -

 1) पाण्डे राजमलजी ने कहा है - शक्ति, लक्षण, विशेष, धर्म, रूप, गुण, स्वभाव, प्रकृति, शील, आकृति और अङ्ग एकार्थवाचक शब्द हैं। ये सब एकार्थवाची है।

 "शक्तिर्लक्ष्मविशेषो, धर्मो रूपं गुणः स्वभावश्च।
    प्रकृतिशीलं चाकृतिरेकार्थवाचका अमी शब्दाः॥"        

                                             - पञ्चाध्यायी, पूर्वाद्,48
लक्षणं च गुणश्चाङ्गं शब्दाञ्चैकार्थवाचकाः।(उत्तरार्द्ध, 478)

 2) कोशकारों ने गुण शब्द के अनेक अर्थ बताये हैं, जिनके आधार पर हम गुण के वास्तविक भाव तक पहुँच सकते हैं। जैसे - धर्म, स्वभाव, विशेषता, श्रेष्ठता, गौरव, लाभ, प्रभाव, परिणाम, रस्सी, धनुष, डोरी, खूबी, प्रकृति का अवयव या उपादान, इन्द्रियजन्य विषय - स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द, गुणाकार, गौणत्व, आश्रित, अंश, आधिक्य, विशेषण, गुणादेश, शब्दसमूह का अर्थ ज्ञानेन्द्रिय, विशिष्ट भोजन या परित्याग आदि।

 

 
गुण के पर्यायवाची लक्षण का स्वरूप -

गुण के संबंध में अन्य मत द्वारा माने हुए समवाय संबंधादि मिथ्या हैं जिन मत के अनुसार तादात्म्य संबंध ही समवाय संबंध है।

 गुणांशके अर्थमें गुण शब्दका प्रयोग

 
त. सू./५/३३-३६ स्निग्धरुक्षत्वात् बन्धः ॥३३॥ न जघन्थगुणामां ।२४॥ गुणसाम्ये सदशा.स ।३५॥ द्वघधिकादि गुणानां तु । 3 ६।

 स. सि./५/३५/३०४/१० गुणसाम्यग्रहणं तुल्यभागसंप्रत्ययार्थम् ।

 रा. वा./५/३४/२/४६८/२१ तत्रेह भागे वर्तमानः परिगृह्यते । जघन्यो गुणो येषां ते जधन्यगुणास्तेषां जधन्यगुणानां नास्ति बन्ध ।

 

ध. १४/५,६,५३६/४५०/५
एयगुणं ति किं घेण्पदि जहण्णगुणस्स गहणं ।
सो च जहण्णगुणो अणं तेहि अविभागपडिच्छेदेहि णिन्पण्णो ।

 ध. १४/५,६.५४०/४५१/५ गुणस्स विदियअनत्थाविसेसो विदियगुणो णाम । तदियो अवर्थाविसेसो तदियगुणो णाम । १. स्निग्धत्व और रूक्षत्वसे बन्ध होता है ॥३३ ॥ जन्य गुणवाले पुद्गलोंका बन्ध नहीं होता है !३४॥ समान गुण होनेपर तुल्य जातिवालोंका बन्ध नही होता है ।३। दो अधिक गुणवालोका बन्ध होता २. तुर्य शक्तव शोंका ज्ञान करानेके लिए 'गुणसाम्य' पदका ग्रहण किया है । ३. यहाँ भाग अर्थ विवक्षित है। जिनके जघन्य (एक) गुण होते हैं वे जघन्य गुण कहलाते हैं । उनका बन्ध नहीं होता। ४, एक गुणसे जघन्य गुण ग्रहण किया जाता है जो अनन्त अबिभागी प्रतिच्छेदोंसे निष्पन्न है । ५. उसके ऊपर एक आदि अविभागी प्रति च्छेदकी वृद्धि होनेपर गुणकी द्वितीयादि अवस्था विशेषोंकी द्वितीय गुण तृतीयगुण आदि संज्ञा होती है।

 

गुण का अनेकार्थों में प्रयोग-

 1) गुणशब्दोऽनेकस्मिन्र्थे दृष्टप्रयोगः कश्चिद्वूपादिषु वर्ते रूपादयो गुणा इति। क्वचिद्भागे वर्तते द्विगुणा यवास्त्रिगुणायवा इति। क्वचिदुपकारे वर्तते गुणज्ञः साधुः उपकारज्ञ इति यावत्। क्वचिद्रव्ये वर्तते - गुणवानयं देश इत्युच्यते अस्मिन् गावः शस्यानि च निष्पद्यन्ते। क्वचित्समेष्ववयवेषु द्वगुणा रग्जुः त्रिगुणा रग्जुरिति । क्वचिदुपसर्जने गुणभूता वयमस्मिन् ग्रामे उपसर्जनभूता इत्यर्थः ।      - तत्त्वार्थवार्तिकम्, 2/34
अर्थ- गुण का अनेक अर्थों में प्रयोग का निर्देश करते हुए आचार्य अकलंक कहते हैं - गुण शब्द के अनेक अर्थ हैं जैसे रूपादि गुण (रूप-रस-गन्ध-स्पर्श इत्यादि गुण), में गुण का अर्थ रूपादि है। 'दो गुणा यव तीन गुणा यव' में गुण का अर्थ भाग है। 'गुणज्ञ साधु' में या 'उपकारज्ञ' में उपकार अर्थ है। 'गुणज्ञ साधु' में या 'उपकारज्ञ' में उपकार अर्थ है। 'गुणवान देश' में द्रव्य अर्थ है, क्योंकि जिसमें गायें या धान्य अच्छा उत्पन्न होता है, वह देश गुणवान कहलाता है। 'द्विगुण रज्जु त्रिगुण रज्जु' में समान अवयव अर्थ है । 'गुणभूता वयम् ' में गौण अर्थ है।

 

2) जिनागम में गुणस्थान के अर्थ में भी गुण शब्द का प्रयोग किया गया है। जैसे -
  "जेहिं दु लक्खिज्जंते, उदयादिसु संभवेहिं भावेहिं।
      जीवा ते गुण सण्णा, णिहिट्टा सव्वदरिसीहिं ॥"

                      - गोम्मटसार जीवकाण्ड, 8; धवला 1/161

अर्थात् दर्शनमोहनीयादि कर्मों की उदय, उपशम, क्षय, क्षयोपशम आदि अवस्थाओं के होने पर उत्पन्न होनेवाले जिन भावों से जीव लक्षित होते हैं, उन्हें सर्वदर्शियों ने  'गुणस्थान' इस संज्ञा से किया है।

 

3) संयम, संयमासंयम तथा सम्यक्त्वादि भावों को भी गुण के द्वारा जाना जाता है।

 

4)  को पुण गुणा?संजमो सजमासंजमो वा।   

                                                   (-धवला, 15/174)

अर्थात् संयम और संयमासंयम भी गुण कहे जाते हैं।

 5) सम्यग्दर्शनादयो गुणाः, तैः प्रकृष्टा गुणाधिका इति

      विज्ञायन्ते ।                        - तत्वार्थवार्तिक, 7/11
अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र आदि गुण हैं, वे गुण जिनके अधिक हैं, वे गुणाधिक कहलाते हैं।

 
6) इसी प्रकार श्री वीरसेनस्वामी जीव के भावों तथा आत्मा को भी गुणसंज्ञा से विभूषित करते हैं
शङ्का- जीव कहाँ रहते हैं?

समाधान - जीव, गुणों में रहते हैं।

 शङ्का वे गुण कौनसे हैं?
समाधान औदयिक, ओपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक और पारिणामिक - ये पाँच प्रकार के गुण (भाव) हैं ।

 

7) पञ्चसंग्रह में कहा भी है -      'जीवा ते गुणसण्णा"
- इन गुणों के साहचर्य से आत्मा को भी 'गुण' संज्ञा प्राप्त

होती है।"                       (-पञ्चसंग्रह प्राकृत, 1/3)

 
8) श्री ब्रह्मदेवसूरि ने भी स्वभाव-विभावरूप गुणों की चर्चा की है-
"जीवस्य यावत् कथ्यन्ते सिद्धत्वादयः स्वभावपर्यायाः, केवलज्ञानादयः स्वभावगुणा असाधारणा इति। अगुरुलघुका स्वभावगुणास्तेयामेव गुणानां षड्ढानिवृद्धिरूपस्वभाव पर्यायाश्च सर्वंद्रव्यसाधारणाः। तस्यैव जीवस्य मतिज्ञानादिविभावगुणाः नरनारकादिविभाव-पर्यायाश्च इति।

इदानीं पुद्गलस्य कथ्यन्ते केवलपरमाणुरूपेणावस्थानं स्वभावपर्यायः वर्णान्तरादि-रूपेण परिणमनं वा। तस्मिन्नेव परमाणौ वर्णादयः स्वभावगुणा इति। द्वयणुकादिरूप-स्कन्धरूपविभावपर्यायास्तेष्वेव द्वगणुकादिस्कन्धेषु वर्णान्ध विभावगुणाः इति भावार्थः। अत्र शुद्धगुणपरयायसहितः शुद्धजीव एवोपादेय इति भावार्थः।           -बृहद्रव्यसंग्रह

 अर्थ- "जीव की अपेक्षा कहते हैं सिद्धत्वादि स्वभावपर्याय हैं और केवलज्ञानादि उसके असाधारणस्वभावगुण हैं और अगुरुलघु उसके साधारणस्वभावगुण हैं, उन्हीं गुणों की षड्गुणी हानि-वृद्धिरूप स्वभावपर्याय होती है, जो सर्व द्रव्यों में साधारण है। उसी जीव के मतिज्ञानादि विभावगुण हैं तथा नर-नारकादि विभावपर्यायें हैं ।

 
अब पुद्गल के सम्बन्ध में कहते हैं - केवल परमाणुरूप से स्थित रहना, स्वभावपर्याय है अथवा एक वर्ण से वर्णान्तररूप परिणमन करना, स्वभावपर्याय है। उसी परमाणु में वर्णादि स्वभावगुण हैं। द्व्यणुकादिस्कन्धरूप पर्यायें विभावपर्यायें हैं, उन द्व्यणुकादि स्कन्धों में रहनेवाले वर्णादिक गुण विभावगुण होते हैं ऐसा भावार्थ है। यहाँ
शुद्धगुण-पर्यायों से सहित शुद्धजीव ही उपादेय है - ऐसा तात्पर्य है।"

 

9)आचार्य श्री वसुनन्दि ने तो अणिमा, महिमा आदि ऋद्धियों को ही गुण कहा है। वे कहते हैं -

 "अणिमा महिमा लघिमा, पागम्म वसित्त कामरुवित्तं।
       ईसत्त पावणं तह, अट्ठगुणा वणिया समए॥"

                                    -  वसुनन्दि श्रावकाचार, 513
अर्थात् अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राकाम्य, वशित्व, कामरूपित्व, ईशत्व और प्राप्ति ये आठ गुण जिनागम में कहे गये हैं।"

 

10) पं.ध./पू./४८ शक्तिलक्ष्मविशेषो धर्मो रूपं गुण' स्त्रभावश्च। प्रकृतिशीलं चाकृतिरेकार्थवाचका अमी शब्दाः ४८)

पं.ध./उ./४७८ लक्षणं च गुणश्चाडगं शब्दार्चैंकार्थवाचका ४७८ -- १. হक्ति, लक्षण, विशेष, धर्म, रूप, गुण, स्वभाव, प्रकृति, शील और आकृति ये सब शब्द एक ही अर्थ के बाचक हैं ।४८॥ २. लक्षण, गुण और अंग यै सब एकार्थवाचक शब्द हैं ।

इस प्रकार गुण की व्युत्पत्ति और पर्यायवाची समझ कर उसके लाभ के बारे में कुछ विचार करना चाहिए-

" निर्मोह होना चाहते तो गुणों की पहिचान से।
तुम भेद जानो स्व-पर में जिनमार्ग के आधार से ।।90।।"
उक्त गाथा और उसकी टीका में मात्र इतना ही कहा गया है कि जिसप्रकार एक कमरे में अनेक दीपक जलते हों तो ऐसा लगता है कि सबका प्रकाश परस्पर मिल गया है, एकमेक हो गया है; किन्तु जब एक दीपक उठाकर ले जाते हैं तो उसका प्रकाश उसके ही साथ जाता है और उतना प्रकाश कमरे में कम हो जाता है; इससे पता चलता है कि कमरे में विद्यमान सभी दीपकों का प्रकाश अलग-अलग ही रहा है।

 उसीप्रकार इस लोक में सभी द्रव्य एकक्षेत्रावगाहरूप से रह रहे हैं, महासत्ता की अपेक्षा से एक ही कहे जाते हैं; तथापि स्वरूपास्तित्व की अपेक्षा वे जुदे-जुदे ही हैं। इस लोक में विद्यमान सभी चेतन-अचेतन पदार्थों से मेरी सत्ता भिन्न ही है ह ऐसा निर्णय होते ही पर से एकत्व का मोह विलीन हो जाता है और राग-द्वेष भी टूटने लगते हैं।

यहाँ  एक प्रश्न होता है कि यद्यपि ज्ञान जीव का असाधारण गुण है, विशेष गुण है; तथापि पाये जाने वह सभी जीवों में पाया जाता है । सभी जीवों में के कारण एकप्रकार से वह सामान्य गुण भी है। इस ज्ञान नामक गुण के माध्यम से जड़ से भिन्न सभी जीवों को तो जाना जा सकता है; परन्तु परजीवों से भी भिन्न अपने आत्मा को नहीं । हमें तो परजीवों से भी भिन्न निज आत्मा को जानना है, हम उसे कैसे जाने ?

 मेरा ज्ञानगुण मेरे में है और आपका ज्ञानगुण आप में मेरा ज्ञानगुण ही मेरे लिए ज्ञान है; क्योंकि मैं तो उसी से जानने का काम कर सकता हूँ, आपके ज्ञानगुण से नहीं। आपका ज्ञानगुण तो मेरे लिए एकप्रकार से ज्ञान नहीं, ज्ञेय है। अन्य ज्ञेयों के समान यह भी एक ज्ञेय है ।निष्कर्ष के रूप में हम यह द्रव्य गुण पर्याय स्व-पर पर घटा सकते है-

द्रव्य -मेरे लिए मेरा आत्मा ज्ञायक है मेरा लिए दूसरों का ज्ञायक ज्ञेय है।दूसरों के लिए मेरा ज्ञायक ज्ञेय है ज्ञायक नहीं।

गुण-आपका ज्ञान गुण मेरे लिए ज्ञेय है और मेरा ज्ञान गुण आपके लिए ज्ञेय है ज्ञान नहीं।

पर्याय - ज्ञायक की वर्तमान समय की ज्ञान की पर्याय जानने का काम करती है वह दूसरों के लिए ज्ञेय है।वह पर्याय दूसरे(अगले) समय ज्ञानरूप से नहीं रहेगी वह ज्ञेय तो सकती है। 
-इत्यलम्

Thursday, November 4, 2021

दूर हम स्वयं से है

 बहुत चाहा पास जाना,

किंतु तनिक न पहुंच पाया ,

सोचता था पास होऊंगा,

लेकिन दूर होता जा रहा था।

वे तो बैठे मंजिलो में
देखते थे मार्ग अपना,
लेकिन था वो कठिन इतना
मानो  कोई-हो-एक सपना

लेकिन वो था सरल इतना
सचमुच में कोई खेल जितना
दो और दो चार जितना
या  चार एकम चार जितना

दो शब्द देकर बतला गए ,
अपने पास आने की विधि वे,
किंतु पास होते होते अभी तक,
हम दो दशक भी खो चुके थे ।

अब समझ में आया हे ईश्वर!
मैं पास समझा जिसे अभी तक ,
दूर उतना ही मैं उनके
होते जा रहा था ।

एक बात और जो समझी अभी मैं
कारण था बस एक यही-
"दूर वे नहीं
हम स्वयं से ही होते जा रहे थे"
                                        -आप्त जैन